Tuesday, December 9, 2025

Adhyay 7, Sloka 20 - Srimad Bhagavad Gita | Meaning & Analysis

Adhyay 7, Sloka 20 - Srimad Bhagavad Gita | Meaning & Analysis
Chapter 7 • Verse 20
कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥

1 लिप्यंतरण

कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥

2 शुद्ध उच्चारण मार्गदर्शन

पंक्ति १: का-मै-स्-तै-स्-तै-र्-ह-त-ज्ञा-ना: प्र-प-द्य-न्ते-ऽ-न्य-दे-व-ता: ।
(ध्यान दें: 'कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः' = कामैः + तैः + तैः + हतज्ञानाः; 'प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः' = प्रपद्यन्ते + अन्यदेवताः)
पंक्ति २: तं तं नि-य-म-मा-स्था-य प्र-कृ-त्या नि-य-ता: स्व-या ।
(ध्यान दें: 'तं तं' में दोनों 'तं' हलंत; 'प्रकृत्या नियताः स्वया' = प्रकृत्या + नियताः + स्वया)

3 संयुक्त / पोर्टमांटू शब्दार्थ

संस्कृत शब्दहिंदी अर्थ
कामैः तैः तैःविभिन्न प्रकार की कामनाओं (इच्छाओं) से।
हतज्ञानाःजिनका ज्ञान नष्ट हो गया है।
प्रपद्यन्तेशरण लेते हैं।
अन्यदेवताःअन्य देवताओं को।
तं तं नियमम्उस उस नियम (विधि) को।
आस्थायअपनाकर।
प्रकृत्या नियताः स्वयाअपनी ही (त्रिगुणात्मक) प्रकृति से नियन्त्रित होकर।

4 पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

पंक्ति १: कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
अर्थ: विभिन्न कामनाओं से जिनका ज्ञान नष्ट हो गया है, वे लोग अन्य देवताओं की शरण लेते हैं।

पंक्ति २: तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ।
अर्थ: अपनी ही प्रकृति से बँधकर, उस उस (देवता विशेष के) नियम (विधि-विधान) का पालन करते हुए।

5 सम्पूर्ण श्लोक का सरल अर्थ

श्रीभगवान ने कहा – जिन लोगों का ज्ञान विभिन्न इच्छाओं (कामनाओं) से नष्ट हो गया है, वे अपनी स्वाभाविक (गुणात्मक) प्रकृति से बँधकर, उस उस (देवता विशेष के अनुसार) नियम का पालन करते हुए, अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।
भगवान कहते हैं कि अज्ञानी लोग अपने इच्छाओं और स्वभाव के अनुसार अलग-अलग देवताओं की शरण में जाते हैं। प्रत्येक का पालन अपने स्वभाव और पूर्व कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है।

6 गहरा आध्यात्मिक अर्थ

यह श्लोक बहुदेवोपासना के मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक कारणों को उजागर करता है।
'कामैः तैः तैः हतज्ञानाः' – यहाँ मूल कारण है कामनाएँ (भौतिक इच्छाएँ)। ये कामनाएँ ही विवेक को नष्ट कर देती हैं, जिससे व्यक्ति परम एक सत्य (भगवान) को भूलकर अनेक सीमित देवताओं की ओर आकर्षित होता है।
'अन्यदेवताः' ये प्रकृति के विभिन्न गुणों एवं शक्तियों के प्रतीक हैं, जिनकी उपासना फल-कामना से युक्त होती है।
'प्रकृत्या नियताः स्वया' अत्यंत महत्वपूर्ण है – यह दर्शाता है कि यह बहुदेवोपासना उपासक की अपनी ही गुणात्मक प्रकृति (सत्त्व, रज, तम) से निर्धारित होती है। रजोगुणी व्यक्ति ऐश्वर्य के देवता की, तमोगुणी व्यक्ति भय या शक्ति के देवता की उपासना करता है।
'तं तं नियममास्थाय' यह दर्शाता है कि इसमें भी निष्ठा और अनुशासन होता है। गहरा संदेश यह है कि यह मार्ग अज्ञान एवं कामना से प्रेरित है, और इससे भगवान तक की प्राप्ति नहीं हो पाती, केवल अस्थायी फलों तक सीमित रह जाता है।
इस श्लोक में बताया गया है कि अज्ञान और कामनाओं में फंसे लोग अलग-अलग देवताओं की पूजा करते हैं।
यह संकेत करता है कि सत्य मार्ग और परमात्मा का ज्ञान न होने पर लोग अपने स्वभाव और इच्छाओं के अनुसार भटक जाते हैं।
साधक को यह समझना चाहिए कि ईश्वर की सच्ची भक्ति ज्ञान और विवेक के साथ होनी चाहिए।
यह श्लोक अधज्ञान और मोह में फंसे लोगों की प्रवृत्ति का वर्णन करता है।
इसका संदेश यह है कि सच्चा मार्ग केवल ज्ञान और भक्ति से प्राप्त होता है, न कि केवल इच्छा और स्वभाव से।

লিপ্যন্তরণ

কামৈস্তৈস্তৈর্হতজ্ঞানাঃ প্রপদ্যন্তেঽন্যদেবতাঃ ।
তং তং নিয়মমাস্থায প্রকৃত্যা নিয়তাঃ স্বযা ॥ ২০ ॥

সঠিক উচ্চারণ নির্দেশিকা

পংক্তি ১: বা-মৈ-স্-তৈ-স্-তৈ-র্-হ-ত-জ্ঞা-না: প্র-প-দ্য-ন্তে-ঽ-ন্য-দে-ব-তা: ।
(দ্রষ্টব্য: 'কামৈস্তৈস্তৈর্হতজ্ঞানাঃ' = কামৈঃ + তৈঃ + তৈঃ + হতজ্ঞানাঃ; 'প্রপদ্যন্তেঽন্যদেবতাঃ' = প্রপদ্যন্তে + অন্যদেবতাঃ)
পংক্তি ২: তং তং নি-য-ম-মা-স্থা-য প্র-কৃ-ত্যা নি-য-তা: স্ব-যা ।
(দ্রষ্টব্য: 'তং তং' এ দুটি 'তং' হলন্ত; 'প্রকৃত্যা নিযতাঃ স্বযা' = প্রকৃত্যা + নিযতাঃ + স্বযা)

যৌগিক শব্দার্থ

মূল শব্দবাংলা অর্থ
কামৈঃ তৈঃ তৈঃবিভিন্ন প্রকারের কামনা (ইচ্ছা) দ্বারা।
হতজ্ঞানাঃযাদের জ্ঞান নষ্ট হয়েছে।
প্রপদ্যন্তেশরণাগত হয়।
অন্যদেবতাঃঅন্য দেবতাদের।
তং তং নিয়মম্সেই সেই নিয়ম (পদ্ধতি)।
আস্থাযঅবলম্বন করে।
প্রকৃত্যা নিযতাঃ স্বযানিজেরই (ত্রিগুণাত্মক) প্রকৃতি দ্বারা নিয়ন্ত্রিত হয়ে।

পংক্তি-অনুযায়ী অর্থ

পংক্তি ১: কামৈস্তৈস্তৈর্হতজ্ঞানাঃ প্রপদ্যন্তেঽন্যদেবতাঃ ।
অর্থ: বিভিন্ন কামনা দ্বারা যাদের জ্ঞান নষ্ট হয়েছে, তারা অন্য দেবতাদের শরণাগত হয়।

পংক্তি ২: তং তং নিয়মমাস্থায প্রকৃত্যা নিযতাঃ স্বযা ।
অর্থ: নিজেরই প্রকৃতি দ্বারা বদ্ধ হয়ে, সেই সেই (দেবতা বিশেষের) নিয়ম পালন করে।

সম্পূর্ণ শ্লোকের সারমর্ম

শ্রীভগবান বললেন – যাদের জ্ঞান বিভিন্ন ইচ্ছা (কামনা) দ্বারা নষ্ট হয়েছে, তারা নিজের স্বাভাবিক (গুণাত্মক) প্রকৃতি দ্বারা বদ্ধ হয়ে, সেই সেই (দেবতা বিশেষ অনুযায়ী) নিয়ম পালন করতে করতে, অন্য দেবতাদের শরণাগত হয়।
শ্রীকৃষ্ণ বলেন যে অজ্ঞ ব্যক্তিরা স্বভাব এবং ইচ্ছা অনুযায়ী আলাদা আলাদা দেবতার কাছে যায়।
প্রতিটি মানুষের আচরণ পূর্বজন্মের প্রভাব এবং স্বভাব অনুযায়ী নির্ধারিত হয়।

গভীর আধ্যাত্মিক ব্যাখ্যা

এই শ্লোকটি বহুদেবোপাসনার মনস্তাত্ত্বিক ও আধ্যাত্মিক কারণ উদ্ঘাটিত করে। 'কামৈঃ তৈঃ তৈঃ হতজ্ঞানাঃ' – এখানে মূল কারণ হল কামনা (ভৌত ইচ্ছা)। এই কামনাই বিবেক নষ্ট করে দেয়, ফলে ব্যক্তি পরম এক সত্য (ভগবান) ভুলে অনেক সীমিত দেবতার দিকে আকৃষ্ট হয়। 'অন্যদেবতাঃ' এগুলি প্রকৃতির বিভিন্ন গুণ ও শক্তির প্রতীক, যাদের উপাসনা ফল-কামনা যুক্ত হয়। 'প্রকৃত্যা নিযতাঃ স্বযা' অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ – এটি দেখায় যে এই বহুদেবোপাসনা উপাসকের নিজেরই গুণাত্মক প্রকৃতি (সত্ত্ব, রজ, তম) দ্বারা নির্ধারিত হয়। রজোগুণী ব্যক্তি ঐশ্বর্যের দেবতার, তমোগুণী ব্যক্তি ভয় বা শক্তির দেবতার উপাসনা করে। 'তং তং নিয়মমাস্থায' এটি দেখায় যে এতেও নিষ্ঠা ও শৃঙ্খলা থাকে। গভীর বার্তা হল যে, এই পথ অজ্ঞান ও কামনা দ্বারা প্রেরিত, এবং এর দ্বারা ভগবান পর্যন্ত পৌঁছানো যায় না, কেবল অস্থায়ী ফল পর্যন্ত সীমিত থাকে।

অজ্ঞ এবং কামনার বন্দীদের প্রবৃত্তি অনুযায়ী তারা বিভিন্ন দেবতার দিকে চলে যায়।
এটি নির্দেশ করে যে সত্যি জ্ঞান না থাকা অবস্থায় মানুষ বিভ্রান্ত হয়।
একজন সাধককে বোঝা উচিত যে সত্যিকারের ভক্তি এবং পথ জ্ঞান এবং বিবেকের মাধ্যমে হয়।
এই শ্লোক অজ্ঞ এবং মায়ার প্রভাবের অধীনে মানুষের আচরণ প্রদর্শন করে।
শিক্ষা হলো: সত্যিকারের পথ শুধুমাত্র জ্ঞান এবং ভক্তির মাধ্যমে পাওয়া যায়, শুধুমাত্র ইচ্ছা এবং স্বভাবের দ্বারা নয়।

1 Transliteration

kāmais tais tair hata-jñānāḥ prapadyante 'nya-devataḥ |
taṁ taṁ niyamam āsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā || 20 ||

2 Pronunciation Guide

Line 1: kā-mais tais tair ha-ta-jñā-nāḥ pra-pad-yan-te 'nya-de-va-tāḥ.
(Note: 'kāmais tais tair hatajñānāḥ' = kāmaiḥ + taiḥ + taiḥ + hata-jñānāḥ; 'prapadyante 'nyadevataḥ' = prapadyante + anya-devataḥ)
Line 2: taṁ taṁ ni-ya-mam ā-sthā-ya prakṛ-tyā ni-ya-tāḥ sva-yā.
(Note: 'taṁ taṁ' both have anusvāra; 'prakṛtyā niyatāḥ svayā' = prakṛtyā + niyatāḥ + svayā)

3 Word Meanings

Sanskrit TermEnglish Meaning
kāmaiḥ taiḥ taiḥBy various desires.
hata-jñānāḥThose whose wisdom/discernment is destroyed.
prapadyanteSurrender/take refuge.
anya-devataḥTo other gods/deities.
tam tam niyamamThat particular rule/discipline.
āsthāyaAdopting/taking up.
prakṛtyā niyatāḥ svayāRegulated/controlled by their own (material) nature.

4 Line-by-Line Meaning

Line 1: kāmais tais tair hata-jñānāḥ prapadyante 'nya-devataḥ |
Meaning: Those whose wisdom is carried away by various desires surrender to other gods (deities).

Line 2: taṁ taṁ niyamam āsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā |
Meaning: They adopt the particular rules pertaining to each (deity), being impelled by their own (material) nature.

5 Final Meaning of the Sloka

The Blessed Lord said: Those whose wisdom is carried away by various desires surrender to other gods (deities). Following the particular rules pertaining to each, they are regulated by their own (material) nature.
Krishna explains that ignorant people, driven by desires and lack of knowledge, take refuge in various deities.
Each person follows a path or deity according to their natural disposition and past tendencies.

6 Deep Spiritual Insight

This verse explains the psychology and metaphysics behind polytheistic worship. The root cause is kāma—specific material desires for wealth, power, progeny, etc. These desires hata-jñāna—obscure or destroy the higher discriminative wisdom (viveka) that would lead one to the one Supreme Source. Thus, the mind becomes attracted to anya-devataḥ—various demigods or celestial controllers who preside over specific aspects of material energy (like wealth, knowledge, power).
The phrase prakṛtyā niyatāḥ svayā is crucial: it reveals that such worship is not a free choice but is dictated and conditioned by the worshipper's own guṇas (modes of material nature). A person in rajas (passion) is drawn to deities of power and prosperity; one in tamas (ignorance) might worship fearsome or occult powers.
Taṁ taṁ niyamam āsthāya shows that such worship can involve sincere discipline and prescribed rituals.
The deep teaching is that this path, though meritorious, is born of ignorance (ajñāna) and binding desire (kāma). It leads only to temporary, material rewards within the cycle of birth and death, not to liberation or union with the Supreme Person.
Ignorant and desire-driven individuals wander towards different deities seeking fulfillment.
The verse indicates that without true knowledge, people remain spiritually misguided.
True devotion and connection with God require wisdom and discernment, not merely following desires.
This shloka highlights the influence of human nature and past tendencies on spiritual practice.
Spiritual teaching: the highest path is achieved through knowledge and devotion, not merely through whims or inclinations.

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